पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

 

Rita and ritam words have been used in Rigveda quite often.According to the information given by Dr. G.N.Bhat in his book ‘Vedic Nighantu’, the word ritam and its forms(including compounds) occurs in Rigveda in 572 places. Sayana interprets the word ritam as water(because the word has been classified under synonyms for water ). The word ritasya yonih occurs in Rigveda at 8 places and has been interpreted as birth place of water. In two hundred places the word is used in the sense of truth, including those which are used as adjectives (because the word is listed in  satyanamani). In some places it is used in the sense of yajna/sacrifice. Moreover, Nighantu classifies the word ritam under synonyms for wealth also and nowhere has been assigned this sense in his interpretations by Sayana. Ritah word occurs under synonyms for pada or stages. The authority of vedic words Yaska says in his book Nirukta that the word ritam is a synonym of water, because it pervades everything. This just indicates what confusion prevailed even at earlier times about the actual meaning of words rita and ritam.

At present also, there is confusion about what is rita and what is satya/truth. There are some references in vedic texts which differentiate between non-truth/anrita, half- truth/rita, and truth/satyam. These have been given the shape of a tree whose root is anrita, stem or unripe fruits  are rita and    ripe fruits are satya. This simile is well known in astrological literature and it’s meaning has been clarified by the websites attributed to an old astrologer Steiner. According to him, the unripe and ripe fruits pertain to different stages of consciousness. Different planets take the consciousness to a particular level. Jupiter or Brihaspati takes to the highest level. The root has perhaps been attributed to Saturn. So, on one side, ritam is connected to the root or anrita, which can be called those forces which sustain our basic structure. On the other side, rita is connected to truth. It seems that rita word may be the origin of word rhythm in English language.

The present study collects specific references to rita and its compound forms in puraanic and vedic literature and comments on these to the extent possible.

 

REFERENCE

G.N.Bhat

Vedic Nighantu

(Mangalore University, Konaje - 574199, ) price 125/-

 

ऋत

*एतस्मान्मनोमयात् अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः तेनैष पूर्णः - - - तस्य श्रद्धैव शिरः। ऋतं दक्षिणः पक्षः सत्यमुत्तरपक्षः। योग आत्मा। महः पुच्छं प्रतिष्ठा।

     इस विज्ञानमय पुरुष के दक्षिण और उत्तर पक्ष क्रमशः ‘सत्य’ तथा ‘ऋत’ बताए गए हैं। इन दोनों शब्दों के प्रचलित अर्थ अत्यन्त भ्रामक हैं, यहां उनसे काम नहीं चल सकता। उपनिषद में लिखा है कि सत्य शब्द के केवल ‘’ और ‘’ ही सत्य के द्योतक हैं और दोनों के बीच का ‘त्’ अनृत का वाचक है। इससे स्पष्ट है कि ‘सत्य’ का अर्थ प्रचलित अर्थ से विपरीत, अनृतपूर्ण सत्य भी हो सकता है।

     वस्तुतः सत्य और ऋत का जोडा, आध्यात्मिक प्रसंगों में, प्रचलित अर्थ से कुछ भिन्न अर्थ रखता है। इनका अर्थ क्रमशः सत्व (being) और भाव (becoming) अथवा सत्ता और विकृति किया जा सकता है। पहला स्थिरता या निष्क्रियता का सूचक है, दूसरा परिवर्तन या विकार का। नाम-रूपात्मक जगत में ये दोनों तत्त्व सापेक्षिक रूपों में ही मिलते हैं, न यहां सत्व (being) ही आत्यन्तिक है और न भाव  (becoming) ही। अतः आदित्य को सत्य तथा अग्नि को ऋत कहा जाता है; परन्तु अग्नि तथा उसके प्रकाश में, अग्नि को सत्य तथा प्रकाश को ऋत कहा जाता है। उसी प्रकार यदि सृष्टि या उसकी उपकरणीभूत वाक् को ऋत कहा जाता है, तो स्रष्टा को सत्य कहा जाता है या सत्यमय माना जाता है, परन्तु वही स्रष्टा ऋत कहा जाता है, जब उसकी तुलना कारण-ब्रह्म से की जाती है। ऐसे ही स्थूल शरीर की अपार विकारशीलता को देखकर उसको ऋत तथा वीर्य, प्राण, नाम रूप आदि को सत्य कहा जाता है।

इस विवेचन से यह सिद्ध है कि ‘ऋत’ शब्द विकार, परिवर्तन या गति-वाची ‘भाव’ शब्द का पर्याय है और ‘सत्य’ शब्द से सत्व के अन्तर्गत उस स्थिरता या अगति का बोध होता है जिससे ऋत या भाव की गति अथवा विकृति का सूत्रपात होता है। अतः ऋत या भाव (becoming) को यथार्थ में, गतिशील या विकृतिमय सत्त्व (being) कहा जा सकता है। इसी दृष्टिकोण से सत्य और ऋत को एक ही कहा जाता है। प्राणमय तथा अन्नमय में ऋत या भाव (becoming) का इतना अधिकार रहता है कि उसके कारण एकांतिक सत्य का आभास भी नहीं मिल पाता। परन्तु विज्ञानमय में आकर ऋत् ‘म्’ अर्थात् सुप्त हो जाता है। इसीलिए, इस अवस्था में ऋत् को मऋत(म्+ ऋत) कहा जाता है। जब ऋत और सत्य का तादात्म्य हो जाता है, तो सुप्त सत्य (मृत) भी नहीं रह जाता, अतः उसका नाम ‘अमृत’ (अ-म्-ऋत) हो जाता है। - डा. फतहसिंह, वैदिक दर्शन पृष्ठ ४४-४६(यह ग्रन्थ डिजिटल लाईब्रेरी आफ इंडिया में उपलब्ध है। VEDIC DARSHAN

 

 

टिप्पणी : ऋग्वेद ४.२३.८- १० का देवता ऋतम् है । वैदिक साहित्य में ऋतम् की व्याख्याओं के अनपेक्ष, लैटिन / अंग्रेजी भाषा में रिदम् (rhythem) शब्द उपलब्ध होता है जिसका अर्थ सामञ्जस्य (harmony) लिया जाता है । यह शब्द वैदिक साहित्य के ऋतम् के अर्थ की व्याख्या करने में सफल प्रतीत होता है । वैदिक निघण्टु में तो ऋतम् की परिगणना उदक और सत्य नामों के अन्तर्गत और ऋत की पदनामों के अन्तर्गत की गई है, जबकि सायणाचार्य ने वैदिक ऋचाओं की व्याख्या करते समय ऋतम् का अर्थ यज्ञ ( ऋग्वेद ५.३.९, ६.४४.८ आदि ) और स्तोत्र  ( ऋग्वेद ५.१२.२ , ५.१२.६, ६.३९.२ आदि ) आदि भी किए हैं । ऋतम् का स्तोत्र अर्थ लैटिन के रिदम् के बहुत निकट है क्योंकि स्तोत्र भी तभी उत्पन्न होता है जब सामञ्जस्य उत्पन्न हो जाए ।

          वैदिक निघण्टु, सायण भाष्य आदि में ऋत को सत्य का पर्यायवाची माना जाता है । ऋत और सत्य में अन्तर बताते हुए प्रायः सायण भाष्य में कहा जाता है कि जो मानसिक स्तर पर सत्य है वह ऋत है और जो वाचिक स्तर का सत्य है, वह सत्य है । लेकिन ऋत और सत्य में क्या अन्तर है , इसे हम ऐतरेय आरण्यक २.३.६ के वर्णन के आधार पर समझ सकते हैं । इस वर्णन में एक वृक्ष की कल्पना की गई है जिसका मूल तो अनृतवाक् है और पुष्प व फल सत्यवाक् हैं । कहा गया है कि यदि अनृतवाक् बोली जाएगी तो वह ऐसे होगा जैसे वृक्ष के मूल को उखाड कर बाहर दिखा देना । ऐसा करने पर वृक्ष सूख जाएगा । अतः अनृत वाक् न बोले । इस वर्णन में ऋतवाक् का कहीं नाम नहीं है, किन्तु यह अन्तर्निहित समझा जा सकता है कि इस वृक्ष का स्कन्ध ऋतवाक् का रूप है । इस ऋत का निचला भाग अनृत से जुडा है और ऊपरी भाग सत्य से । वृक्ष के जीवन के लिए अनृत भी आवश्यक है , वह पोषण करता है । इसी प्रकार हमारी देह का पोषण पितर शक्तियां करती हैं, ऐसा वैदिक व पौराणिक साहित्य में कहा जाता है । ऐसा प्रतीत होता है कि पुराणों में अनृत ( अन् - ऋत )को मृत कहा गया है । इसी कारण से भविष्य पुराण में जहां एक ओर ऋतामृत वृत्ति का उल्लेख है, वहीं दूसरी ओर मृत, प्रमृत आदि वृत्तियों का । एक ऋत सत्य से जूडा है तो दूसरा अनृत से ।

          ऋत को और अधिक स्पष्ट रूप से समझने के लिए हमें अनृत का अर्थ ऐसे करना होगा कि अनृत अवस्था में केवल जीवन के रक्षण भर के लिए ऊर्जा विद्यमान है, जीवन को क्रियाशील बनाने के लिए नहीं । ऋत अवस्था जीवन में क्रियाशीलता लाती है, पुष्प, फल उत्पन्न कर सकती है । जीवन में जो भी कामना हो, वह सब ऋतम् का भरण करने से पूर्ण होगी ( द्र. आश्वलायन श्रौत सूत्र ९.७.३५, बौधायन श्रौत सूत्र १८.३२ व १८.३४ में ऋतपेय नामक एकाह )। ऋतम् जीवन की एक अतिरिक्त ऊर्जा है । जब हम सोए रहते हैं तो वह अनृत अवस्था कही जा सकती है । उसके पश्चात् उषा काल की प्राप्ति होने पर सब प्राणी जाग जाते हैं । जैसा कि उषा शब्द की टिप्पणी में कहा गया है, यह उषा अव्यवस्था में, एन}ट्रांपी में वृद्धि का सूचक है

भागवत पुराण में ऋत की माता नड्वला का उल्लेख आता है । तुलना के लिए, ऋग्वेद १.१४२.७ में नक्तोषासा मातृ - द्वय, ५.५.६ में दोषा - उषा मातृद्वय, ६.१७.७ में रोदसी, ९.३३.५ में ब्रह्मी, ९.१०२.७ में ?, १०.५९.८ में रोदसी का ऋत की माता के रूप में उल्लेख है ।

तैत्तिरीय संहिता ७.१.१८.२ तथा आपस्तम्ब श्रौत सूत्र १०.९.८ में ऋत की पत्नी दीक्षा होने का उल्लेख है । अथर्ववेद ७.६.२ तथा तैत्तिरीय संहिता १.५.११.५ में अदिति को ऋत की पत्नी कहा गया है जबकि ऋग्वेद १.१२३.९ में उषा का योषा के रूप में उल्लेख है ।

 

          ऋग्वेद १०.१७९.३ के आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि शृत / पका हुआ शब्द से श का लोप होने पर तथा मृत से म का लोप होने पर ऋत शब्द का निर्माण हुआ होगा । फलित ज्योतिष में कच्चे फल को ऋत का और पके फल को सत्य का प्रतीक माना जाता है ।

          ऋग्वेद १.१०५.४ व १५ आदि में पूर्व और नव्य ऋत का प्रश्न उठाया गया है कि कौन सा ऋत पूर्व्य है और कौन सा नव्य ? ऋग्वेद १०.१७९.३ में इसका उत्तर दिया गया है कि शृत होने /पकने के पश्चात् ऋत नवीन हो जाता है । हो सकता है कि पूर्व्य ऋत अनृत से, वृक्ष के मूल से सम्बद्ध हो और नव्य सत्य से, वृक्ष के पुष्पों व फलों से ।

         

           वैदिक साहित्य में कईं स्थानों पर प्रथमजा ऋतस्य ( ऋत से प्रथम उत्पन्न ) का उल्लेख आता है, जैसे द्यावापृथिवी ( अथर्ववेद २.१.४ , ओदन ( अथर्ववेद ४.३५.१ ), आपः देवी ( अथर्ववेद ५.१७.१ ), विश्वकर्मा ( अथर्ववेद ६.१२२.१ ), ६ भूत (अथर्ववेद ८.९.१६ ), ८ भूत (अथर्ववेद ८.९२.१), प्रजापति (अथर्ववेद १२.१.६१ तथा तैत्तिरीय आरण्यक १.२३.९ ), मृत्यु (तैत्तिरीय आरण्यक ३.१५.२ ), अहं (तैत्तिरीय आरण्यक ९.१०.६ ), श्रद्धा ( तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१२.३.२ आदि ) । हो सकता है यह सब ऋत के शृत होने पर उत्पन्न हुए हों । अथर्ववेद ९.५.२१ में ऋत व सत्य को अज ओदन के चक्षु - द्वय कहा गया है जबकि अथर्ववेद ११.३.१३ में ऋत को ओदन का हस्तावनेजन कहा गया है ।

          संदर्भ की पूर्णता के लिए, वैदिक साहित्य में ऋतम् के संदर्भ में उपलब्ध अतिरिक्त सूचनाओं की जानकारी का उल्लेख उपयोगी होगा । तैत्तिरीय संहिता १.१.९.३, बौधायन श्रौत सूत्र १.११ आदि में वेदी का स्फ्य नामक काष्ठ के शस्त्र से विभिन्न दिशाओं में स्पर्श करते हैं । दक्षिण दिशा में वेदी ऋतम् होती है, पश्चिम दिशा में ऋतसदन और उत्तर दिशा में ऋतश्री । ऋग्वेद की कईं ऋचाओं में ऋत के सदन का उल्लेख आता है । सदन उस स्थान को कहते हैं जहां देवता आकर विराजमान हो सकते हैं । ऋतम् के संदर्भ में सदन की क्या विशेषताएं हैं, यह अन्वेषणीय है । ऋग्वेद की कईं ऋचाओं में ऋत के सदन के उल्लेख आए हैं, जैसे १.८४.४ ( इन्द्र के संदर्भ में ), १.१६४.४७ (सुपर्णों के संदर्भ में ), २.३४.१३ ( मरुतों के संदर्भ में ), ३.७.२ ( अग्नि के संदर्भ में ), ३.५५.१२  ( द्यावापृथिवी ० ), ३.५५.१४ (विश्वेदेवों ० ), ४.२१.३ ( इन्द्र ० ), ४.४२.४ ( ? ) , ४.५१.८ ( उषा ० ), ५.४१.१ ( मित्रावरुण ० ), ७.३६.१ (विश्वेदेवों ० ), ७.५३.२( द्यावापृथिवी ० ), ८.५९.४ ( सप्त स्वसार: ० ), ९.१२.१ ( सोम ० ), १०.१००.१० ( गौ ० ) । शतपथ ब्राह्मण ३.३.४.२९, आपस्तम्ब श्रौत सूत्र १०.३१.२, कात्यायन श्रौत सूत्र ७.९.२५ आदि में सोम राजा की यज्ञ में स्थापना के लिए औदुम्बरी आसन्दी / मंच को ऋतसदनी और आसन्दी पर बिछे कृष्णाजिन को ऋतसदन कहा गया है ।

          ऋग्वेद की बहुत सी ऋचाओं में ऋत के पथ व पन्थ का उल्लेख आता है । पौराणिक साहित्य में यह प्रसिद्ध है कि सूर्य , चन्द्र आदि ऋत के पथ से गमन करते हैं । ऋग्वेद १.१२८.२ में अग्नि, १.७९.३ में अग्नि, ६.४४.८ में इन्द्र, ७.६५.३ में मित्रावरुण, ८.२२.७ में अश्विनौ, ९.७.१ में इन्दव:, ९.८६.३३ में सोम, १०.३१.२ में मर्त्य, १०.७०.२ में नराशंस, १०.११०.२ में तनूनपात्, १०.१३३.६ में इन्द्र तथा शतपथ ब्राह्मण ४.३.४.१६ में चन्द्र से ऋत के पथ से गमन की प्रार्थना की गई है । ऋग्वेद ७.६५.३ में तो ऋत के पथ की तुलना नौका से की गई है । ऋत के पन्थ के संदर्भ में ऋग्वेद १.४६.११ में अश्विनौ, १.१२४.३ में उषा, १.१३६.२ में मित्रावरुण, ५.८०.४ में उषा, ७.४४.५ में दधिक्रा, ८.१२.३ में इन्द्र, ८.३१.१३ में मित्रावरुण और अर्यमा, ९.७३.६ में दुष्कृत, ९.९७.३२ में सोम, १०.६६.१३ में विश्वेदेवों, अथर्ववेद ८.९.१३ में तीनों उषाओं, अथर्ववेद १८.४.३ में पितृमेध, तैत्तिरीय संहिता ४.३.११.१ में ३ उषाओं आदि के संदर्भ में ऋत के पन्थ का उल्लेख है । ऋग्वेद ३.१२.७ में इन्द्राग्नी, ३.३१.५ में इन्द्र, ९.९५.२ में पवमान सोम तथा १०.८०.६ में अग्नि के संदर्भ में ऋत की पथ्या का उल्लेख आया है ।

          ऋग्वेद की कईं ऋचाओं में विभिन्न देवताओं के संदर्भ में ऋत की योनि के उल्लेख हैं । ऋत की  योनि क्या है , यह अन्वेषणीय है । तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.७.७.२ के अनुसार क्षत्र ही ऋत की योनि है । शतपथ ब्राह्मण १.३.४.१६ के अनुसार यज्ञ ऋत की योनि है । जैमिनीय ब्राह्मण १.१०४ के अनुसार ग्रह ( यज्ञ पात्र ) ऋत की योनि हैं । ऋग्वेद १.६५.४ में अग्नि, ३.१.११ में अग्नि, ३.५४.६ में विश्वेदेवों, ३.६२.१३ में सोम, ३.६२.१८ में मित्रावरुण, ४.१.१२ में अग्नि, ५.२१.४ में अग्नि, ६.१६.२५ में अग्नि, ९.८.३, ९.१३.९, ९.३२.४, ९.३९.६, ९.६४.११, ९.६४.१७, ९.६४.२०, ९.६४.२२, ९.६६.१२, ९.७२.६, ९.७३.१, ९.८६.२५, ९.१०७.४ में सोम, १०.८.३ में अग्नि, १०.६५.७ में विश्वेदेवों, १०.६५.८ में पितर, १०.६८.४ में बृहस्पति, १०.८५.२४ में सूर्या विवाह के संदर्भ में ऋत की योनि के उल्लेख हैं ।

                   ऋत से सत्य को प्राप्त करने के संदर्भ में ऋग्वेद ३.५४.३ व ४ ( रोदसी के संदर्भ में ), ४.५१.७ ( उषा ० ), ५.६३.१ ( मित्रावरुण ० ), ५.६७.४ ( मित्रावरुण ० ), ६.५०.२ ( विश्वेदेवों ० ), ७.५६.१२ ( मरुतों ० ), ७.७६.४ ( उषा ० ), ९.११३.२ व ४ ( वाक् ० ), १०.१२.१ (द्यावापृथिवी ० ), १०.८५.१ ( आदित्यों व भूमि ० ), १०.१९०.१ ( तप से ऋत व सत्य की उत्पत्ति ० ), तैत्तिरीय संहिता ५.१.५.८ ( ऋत पृथिवी तथा सत्य द्युलोक ० ), अथर्ववेद ११.७.१७ ( उच्छिष्ट में ऋत व सत्य ० ), १२.१.१ ( सत्य बृहद्, ऋत उग्र ० ), १२.५.१ ( ब्रह्मगवी के ऋत में  श्रित तथा सत्य से आवृत होने के ० ), १५.६.५ ( ऊर्ध्वा दिशा के ऋत व सत्य से संबेधित होने )  में ऋत व सत्य के उल्लेख आए हैं ।

          ऋग्वेद १.११७.२२ में दधीचि ऋषि द्वारा ऋत में स्थित होकर अश्विनौ को मधु विद्या का उपदेश देने का उल्लेख आता है ।

प्रथम लेखन : १-१-२००५ ई.

संदर्भ

ऋत

*राजन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिविम्। वर्धमानं स्वे दमे ॥ (दे. : अग्निः) - ऋ. १.१.८

*ऋतेन मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा। क्रतुं बृहन्तमाशाथे ॥ मित्रा- वरुणौ - ऋ.१.२.८

*वि श्रयन्तामृतावृधो द्वारो देवीरसश्चतः। अद्या नूनं च यष्टवे ॥ - ऋ.१.१३.६

*तान् यजत्राँ ऋतावृधो ऽग्ने पत्नीवतस्कृधि। मध्वः सुजिह्व पायय ॥ - ऋ.१.१४.७

*ऋतेन यावृतावृधावृतस्य ज्योतिषस्पती। ता मित्रावरुणा हुवे। - ऋ.१.२३.५

*युवोर्हि पूर्वं सवितोषसो रथमृताय चित्रं घृतवन्तमिष्यति ॥ - ऋ.१.३४.१०

*यमग्निं मेध्यातिथिः कण्व ईध ऋतादधि। तस्य प्रेषो दीदियुस्तमिमा ऋचस् तमग्निं वर्धयामसि ॥ - ऋ.१.३६.११

*दीदेथ कण्व ऋतजात उक्षितो यं नमस्यन्ति कृष्टयः ॥ -ऋ. १.३६.१९

*सुगः पन्था अनृक्षर आदित्यास ऋतं यते। नात्रावखादो अस्ति वः ॥ - ऋ. १.४१.४

*यास्ते प्रजा अमृतस्य परस्मिन् धामन्नृतस्य। मूर्धा नाभा सोम वेन आभूषन्तीः सोम वेद ॥ - ऋ.१.४३.९

*शृण्वन्तु स्तोमं मरुतः सुदानवो ऽग्निजिह्वा ऋतावृधः। - ऋ.१.४४.१४

*अभूदु पारमेतवे पन्था ऋतस्य साधुया। अदर्शि व स्रुतिर्दिवः ॥ - ऋ.१.४६.११

*युवोरुषा अनु श्रियं परिज्मनोरुपाचरत्। ऋता वनथो अक्तुभिः ॥ (अश्विनौ) - ऋ.१.४६.१४

*अयं वां मधुमत्तमः सुतः सोम ऋतावृधा। (अश्विनौ) - ऋ.१.४७.१

*अश्विना मधुमत्तमं पातं सोममृतावृधा। - ऋ.१.४७.३

*ताभिः ष्वस्माँ अवतं शुभस्पती पातं सोममृतावृधा ॥ - ऋ.१.४७.५

*ऋतस्य देवा, अनु व्रता गुर्भुवत्परिष्टिर्द्यौर्न भूम। वर्धन्तीमापः, पन्वा सुशिश्विमृतस्य योना, गर्भे सुजातम्। (अग्निः)- ऋ.१.६५.४

*सोमो न वेधा, ऋतप्रजातः पशुर्न शिश्वा, विभुर्दूरेभाः ॥ (अग्निः) - ऋ.१.६५.५

*य ईं चिकेत, गुहा भवन्तमा यः ससाद, धारामृतस्य। वि ये चृतन्त्यृता सपन्त आदिद् वसूनि, प्र ववाचास्मै ॥ (अग्निः) - ऋ.१.६७.८

*भजन्त विश्वे, देवत्वं नाम ऋतं सपन्तो, अमृतमेवैः ॥ (अग्निः)- ऋ.१.६८.४

*ऋतस्य प्रेषा, ऋतस्य धीतिर्विश्वायुर्विश्वे, अपांसि चक्रुः।(अग्निः)- ऋ.१.६८.५

*वर्धान्यं पूर्वीः, क्षपो विरूपाः स्थातुश्च रथमृतप्रवीतम्। (अग्निः) - ऋ.१.७०.८

*दधन्नृतं धनयन्नस्य धीतिमादिदर्यो दधिष्वो विभृत्राः। (अग्निः) -ऋ.१.७१.३

*स्वाध्यो दिव आ सप्त यह्वी रायो दुरो व्यृतज्ञा अजानन्। विदद् गव्यं सरमा दृह्ळमूर्वं येना नु कं मानुषी भोजते विट् ॥ (अग्निः)- ऋ.१.७२.८

*ऋतस्य हि धेनवो वावशानाः स्मदूध्नी पीपयन्त द्युभक्ताः।(अग्निः) - ऋ.१.७३.६

*यजा नो मित्रावरुणा यजा देवाँ ऋतं बृहत्। अग्ने यक्षि स्वं दमम् ॥ - ऋ.१.७५.५

* यो मर्त्येष्वमृत ऋतावा होता यजिष्ठ इत कृणोति देवान् ॥ (अग्निः) - ऋ.१.७७.१

*यो अध्वरेषु शंतम ऋतावा होता तमू नमोभिरा कृणुध्वम्। - ऋ.१.७७.२

*एवाग्निर्गोतमेभिर्ऋतावा विप्रेभिरस्तोष्ट जातवेदाः। - ऋ.१.७७.५

*यदीमृतस्य पयसा पियानो नयन्नृतस्य पथिभी रजिष्ठैः।अर्यमा मित्रो वरुणः परिज्मा त्वचं पृञ्चन्त्युपरस्य योनौ ॥ - ऋ.१.७९.३

*इममिन्द्र सुतं पिब ज्येष्ठममर्त्यं मदम्। शुक्रस्य त्वाभ्यक्षरन् धारा ऋतस्य सादने ॥ - ऋ.१.८४.४

*को अद्य युङ्क्ते धुरि गा ऋतस्य शिमीवतो भामिनो दुर्हृणायून्। (इन्द्रः) - ऋ.१.८४.१६

*मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः ॥ - ऋ.१.९०.६

*त्वं सोम महे भगं त्वं यून ऋतायते। दक्षं दधासि जीवसे ॥ - ऋ.१.९१.७

*क्व ऋतं पूर्व्यं गतं कस्तद् बिभर्ति नूतनो वित्तं मे अस्य रोदसी ॥ - ऋ.१.१०५.४

*कद् व ऋतं कदनृतं क्व प्रत्ना व आहुतिर्वित्तं मे अस्य रोदसी ॥ - ऋ.१.१०५.५

*कद् व ऋतस्य धर्णसि कद् वरुणस्य चक्षणम्। कदर्यम्णो महस्पथाति क्रामेम दूढ्यो वित्तं मे अस्य रोदसी ॥ - ऋ.१.१०५.६

*ऋतमर्षन्ति सिन्धवः सत्यं तातान सूर्यो वित्तं मे अस्य रोदसी ॥ - ऋ.१.१०५.१२

*व्यूर्णोति हृदा मतिं नव्यो जायतामृतं वित्तं मे अस्य रोदसी ॥ - ऋ.१.१०५.१५

*अवन्तु नः पितरः सुप्रवाचना उत देवी देवपुत्रे ऋतावृधा। - ऋ.१.१०६.३

*ओम्यावती सुभरामृतस्तुभं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम् ॥ - ऋ.१.११२.२०

*यावयद्द्वेषा ऋतपा ऋतेजाः सुम्नावरी सूनृता ईरयन्ती। सुमङ्गलीर्बिभ्रती देववीतिमिहाद्योषः श्रेष्ठतमा व्युच्छ ॥ - ऋ.१.११३.१२

*आथर्वणायाश्विना दधीचे ऽश्व्यं शिरः प्रत्यैरयतम्। स वां मधु प्र वोचदृतायन् त्वाष्ट्रं यद्दस्रावपिकक्ष्यं  वाम् ॥ - ऋ.१.११७.२२

*अस्य मदे स्वर्यं दा ऋतायापीवृतमुस्रियाणामनीकम्। - ऋ.१.१२१.४

*स्वयं स यक्ष्मं हृदये नि धत्त आप यदीं होत्राभिर्ऋतावा ॥ - ऋ.१.१२२.९

*ऋतस्य योषा न मिनाति धामाहरहर्निष्कृतमाचरन्ती ॥ (उषाः) - ऋ.१.१२३.९

*ऋतस्य रश्मिमनुयच्छमाना भद्रंभद्रं क्रतुमस्मासु धेहि। उषो नो अद्य सुहवा व्युच्छास्मासु रायो मघवत्सु च स्युः ॥ - ऋ.१.१२३.१३

*एषा दिवो दुहिता प्रत्यदर्शि ज्योतिर्वसाना समना पुरस्तात्। ऋतस्य पन्थामन्वेति साधु प्रजानतीव न दिशो मिनाति ॥ (उषाः) - ऋ.१.१२४.३

*तं यज्ञसाधमपि वातयामस्यतृस्य पथा नमसा हविष्मता देवताता हविष्मता। (अग्निः) - ऋ.१.१२८.२

*तत् तु प्रयः प्रत्नथा ते शुशुक्वनं यस्मिन् यज्ञे वारमकृण्वत क्षयमृतस्य वारसि क्षयम्। - ऋ.१.१३२.३

*उभे पुनामि रोदसी ऋतेन द्रुहो दहामि सं महीरनिन्द्राः। (इन्द्रः) - ऋ.१.१३३.१

*अदर्शि गातुरुरवे वरीयसी पन्था ऋतस्य समयंस्त रश्मिभिश्चक्षुर्भगस्य रश्मिभिः। (मित्रावरुणौ) - ऋ.१.१३६.२

*तथा राजाना करथो यदीमह ऋतावाना यदीमहे ॥ - ऋ.१.१३६.४

*सुतो मित्राय वरुणाय पीतये चारुर्ऋताय पीतये ॥ - ऋ.१.१३७.२

*यद्ध त्यन्मित्रावरुणावृतादध्याददाथे अनृतं स्वेन मन्युना दक्षस्य स्वेन मन्युना। - ऋ.१.१३९.२

*यदीमुप ह्वरते साधते मतिर्ऋतस्य धेना अनयन्त सस्रुतः ॥ (अग्निः) - ऋ.१.१४१.१

*रश्मींरिव यो यमति जन्मनी उभे देवानां शंसमृत आ च सुक्रतुः ॥ - ऋ.१.१४१.११

*वि श्रयन्तामृतावृधः प्रयै देवेभ्यो महीः। पावकासः पुरुस्पृहो द्वारो देवीरसश्चतः ॥ - ऋ.१.१४२.६

*आ भन्दमाने उपाके नक्तोषासा सुपेशसा यह्वी ऋतस्य मातरा सीदतां बर्हिरा सुमत्। - ऋ.१.१४२.७

*घृतप्रतीकं व ऋतस्य धूर्षदमग्निं मित्रं न समिधान ऋञ्जते। - ऋ.१.१४३.७

*अभीमृतस्य दोहना अनूषत योनौ देवस्य सदने परीवृताः। (अग्निः) - ऋ.१.१४४.२

*अग्ने जुषस्व प्रति हर्य तद् वचो मन्द्र स्वधाव ऋतजात सुक्रतो। - ऋ.१.१४४.७

*व्यब्रवीद् वयुना मर्त्येभ्यो ऽग्निर्विद्वाँ ऋतचिद्धि सत्यः ॥ - ऋ.१.१४५.५

*उभे यत् तोके तनये दधाना ऋतस्य सामन् रणयन्त देवाः। - ऋ.१.१४७.१

*यदीमृताय भरथो यदर्वते प्र होत्रया शिम्या वीथो अध्वरम् ॥ (मित्रावरुणौ) - ऋ.१.१५१.३

*प्र सा क्षितिरसुर या महि प्रिय ऋतावानावृतमा घोषथो बृहत्। - ऋ.१.१५१.४

*आ वामृताय केशिनीरनूषत मित्र यत्र वरुण गातुमर्चथः। - ऋ.१.१५१.६

*युवां यज्ञैः प्रथमा गोभिरञ्जत ऋतावाना मनसो न प्रयुक्तिषु। - ऋ.१.१५१.८

*अवातिरतमनृतानि विश्व ऋतेन मित्रावरुणा सचेथे ॥ - ऋ.१.१५२.१

*गर्भो भारं भरत्या चिदस्य ऋतं पिपर्त्यनृतं नि तारीत् ॥ - ऋ.१.१५२.३

*पीपाय धेनुरदितिर्ऋताय जनाय मित्रावरुणा हविर्दे। - ऋ.१.१५३.३

*तमु स्तोतारः पूर्व्यं यथा विद ऋतस्य गर्भं जनुषा पिपर्तन। (विष्णुः) - ऋ.१.१५६.३

*वेधा अजिन्वत् त्रिषधस्थ आर्यमृतस्य भागे यजमानमाभजत् ॥ - ऋ.१.१५६.५

*प्र द्यावा यज्ञैः पृथिवी ऋतावृधा मही स्तुषे विदथेषु प्रचेतसा। - ऋ.१.१५९.१

*ते हि द्यावापृथिवी विश्वशंभुव ऋतावरी रजसो धारयत्कवी। - ऋ.१.१६०.१

*वधर्यन्तीं बहुभ्यः प्रैको अब्रवीदृता वदन्तश्चमसाँ अपिंशत ॥ (ऋभवः) - ऋ.१.१६१.९

*अत्रा ते भद्रा रशना अपश्यमृतस्य या अभिरक्षन्ति गोपाः ॥ (अश्वः) - ऋ.१.१६३.५

*माता पितरमृत आ बभाज धीत्यग्रे मनसा सं हि जग्मे। - ऋ.१.१६४.८

*द्वादशारं नहि तज्जराय वर्वर्ति चक्रं परि द्यामृतस्य। - ऋ.१.१६४.११

*यदा मागन् प्रथमजा ऋतस्यादिद् वाचो अश्नुवे भागमस्याः ॥ - ऋ.१.१६४.३७

*कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत्पतन्ति। त आववृत्रन् त्सदनादृतस्यादिद् घृतेन पृथिवी व्युद्यते ॥ - ऋ.१.१६४.४७

*मन्मानि चित्रा अपिवातयन्त एषां भूत नवेदा म ऋतानाम् ॥ (मरुत्वानिन्द्रः) - ऋ.१.१६५.१३

*त्वे राय इन्द्र तोशतमाः प्रणेतारः कस्य चिदृतायोः। - ऋ.१.१६९.५

*ये चिद्धि पूर्व ऋतसाप आसन् त्साकं देवेभिरवदन्नृतानि। - ऋ.१.१७९.२

*अन्तर्यद् वनिनो वामृतप्सू ह्वारो न शुचिर्यजते हविष्मान् ॥ (अश्विनौ) - ऋ.१.१८०.३

*उर्वी सद्मनी बृहती ऋतेन हुवे देवानामवसा जनित्री। - ऋ.१.१८५.६

*ऋतं दिवे तदवोचं पृथिव्या अभिश्रावाय प्रथमं सुमेधाः। - ऋ.१.१८५.१०

*तनूनपादृतं यते मध्वा यज्ञः समज्यते। दधत् सहस्रिणीरिषः ॥ (आप्रीसूक्तं) - ऋ.१.१८८.२

*वि घ त्वावाँ ऋतजात यंसद् गृणानो अग्ने तन्वे वरूथम्। - ऋ.१.१८९.६

*तवाग्ने होत्रं तव पोत्रमृत्वियं तव नेष्ट्रं त्वमग्निदृतायतः। - ऋ.२.१.२

*त्वे इन्द्राप्यभूम विप्रा धियं वनेम ऋतया सपन्तः। - ऋ.२.११.१२

*आ विबाध्या परिरापस्तमांसि च ज्योतिष्मन्तं रथमृतस्य तिष्ठसि। - (बृहस्पतिः) - ऋ.२.२३.३

*यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम् ॥ (बृहस्पतिः) - ऋ.२.२३.१५

*स ऋणचिदृणया ब्रह्मणस्पतिर्द्रुहो हन्ता मह ऋतस्य धर्तरि। - ऋ.२.२३.१७

*ऋतावानः प्रतिचक्ष्यानृता पुनरात आ तस्थुः कवयो महस्पथः। - ऋ.२.२४.७

*ऋतज्येन क्षिप्रेण ब्रह्मणस्पतिर्यत्र वष्टि प्र तदश्नोति धन्वना। - ऋ.२.२४.८

*दीर्घाधियो रक्षमाणा असुर्यमृतावानश्चयमाना ऋणानि ॥ (आदित्याः) - ऋ.२.२७.४

*ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥ - ऋ.२.२७.८

*यो राजभ्य ऋतनिभ्यो ददाश यं वर्धयन्ति पुष्टयश्च नित्याः। - ऋ.२.२७.१२

*प्र सीमादित्यो असृजद् विधर्ताf ऋतं सिन्धवो वरुणस्य यन्ति। - ऋ.२.२८.४

*वि मच्छ्रथाय रशनामिवाग ऋध्याम ते वरुण खामृतस्य। - ऋ.२.२८.५

*अपो सु म्यक्ष वरुण भियसं मत् सम्राळृतावोऽनु मा गृभाय। - ऋ.२.२८.६

*ऋतं देवाय कृण्वते सवित्र इन्द्रायाहिघ्ने न रमन्त आपः। (इन्द्रः) - ऋ.२.३०.१

*अस्य मे द्यावापृथिवी ऋतायतो भूतमवित्री वचसः सिषासतः। - ऋ.२.३२.१

*ते क्षोणीभिररुणेभिर्नाञ्जिभी रुद्रा ऋतस्य सदनेषु वावृधुः। - ऋ.२.३४.१३

*यो अप्स्वा शुचिना दैव्येन ऋतावाजस्र उर्विया विभाति। (अपांनपात्) - ऋ.२.३५.८

*अयं वां मित्रावरुणा सुतः सोम ऋतावृधा। ममेदिह श्रुतं हवम्। - ऋ.२.४१.४

*इमा ब्रह्म सरस्वति जुषस्व वाजिनीवति। या ते मन्म गृत्समदा ऋतावरि प्रिया देवेषु जुह्वति ॥ - ऋ.२.४१.१८

*ऋतस्य योनावशयद्दमूना जामीनामग्निरपसि स्वसqणाम् ॥ - ऋ.३.१.११

*वैश्वानराय धिषणामृतावृधे घृतं न पूतमग्नये जनामसि। - ऋ.३.२.१

*रथीर्ऋतस्य बृहतो विचर्षणिरग्निर्देवानामभवत्~ पुरोहितः ॥ - ऋ.३.२.८

*ऋतावानं यज्ञियं विप्रमुक्थ्यमा यं दधे मातरिश्वा दिवि क्षयम्। - ऋ.३.२.१३

*सप्त होत्राणि मनसा वृणाना इन्वन्तो विश्वं प्रति यन्नृतेन। - ऋ.३.४.५

*दैव्या होतारा प्रथमा न्यृञ्जे सप्त पृक्षासः स्वधया मदन्ति। ऋतं शंसन्त ऋतमित् त आहुरनु व्रतं व्रतपा दीध्यानाः ॥ -ऋ.३.४.७

*पूर्वीर्ऋतस्य संदृशश्चकानः सं दूतो अद्यौदुषसो विरोके। (अग्निः) - ऋ.३.५.२

*अधाय्यग्निर्मानुषीषु विक्ष्वपां गर्भो मित्र ऋतेन साधन्। - ऋ.३.५.३

*ऋतस्य वा केशिना योग्याभिर्घृतस्नुवा रोहिता धुरि धिष्व। - ऋ.३.६.६

*प्राची अध्वरेव तस्थतुः सुमेके ऋतावरी ऋतजातस्य सत्ये ॥ - ऋ.३.६.१०

*ऋतस्य त्वा सदसि क्षेमयन्तं पर्येका चरति वर्तनिं गौः ॥ (अग्निः) - ऋ.३.७.२

*ऋतं शंसन्त ऋतमित् त आहुरनु व्रतं व्रतपा दीध्यानाः ॥ (अग्निः) - ऋ.३.७.८

*त्वां यज्ञेष्वृत्विजमग्ने होतारमीळते। गोपा ऋतस्य दीदिहि स्वे दमे ॥ - ऋ.३.१०.२

*इन्द्राग्नी अपसस्पर्युप प्र यन्ति धीतयः। ऋतस्य पथ्या अनु। - ऋ.३.१२.७

*ऋतावा यस्य रोदसी दक्षं सचन्त ऊतयः। हविष्मन्तस्तमीळते तं सनिष्यन्तोऽवसे ॥ (अग्निः) - ऋ.३.१३.२

*अयामि ते नमउक्तिं जुषस्व ऋतावस्तुभ्यं चेतते सहस्वः। - (अग्निः) - ऋ.३.१४.२

*अग्ने त्री ते वाजिना त्री षधस्था तिस्रस्ते जिह्वा ऋतजात पूर्वीः। - ऋ.३.२०.२

*अग्निर्नेता भग इव क्षितीनां दैवीनां देव ऋतुपा ऋतावा। - ऋ.३.२०.४

*अग्निं यन्तुरमप्तुरमृतस्य योगे वनुषः। विप्रा वाजैः समिन्धते। - ऋ.३.२७.११

*शासद् वह्निर्दुहितुर्नप्त्यं गाद् विद्वाँ ऋतस्य दीधितिं सपर्यन्। (इन्द्रः) - ऋ.३.३१.१

*विश्वामविन्दन् पथ्यामृतस्य प्रजानन्नित्ता नमसा विवेश। (इन्द्रः) - ऋ.३.३१.५

*इदं चिन्नु सदनं भूर्येषां येन मासाँ असिषासन्नृतेन ॥ - ऋ.३.३१.९

*प्र सूनृता दिशमान ऋतेन दुरश्च विश्वा अवृणोदप स्वाः ॥ - ऋ.३.३१.२१

*रमध्वं मे वचसे सोम्याय ऋतावरीरुप मुहूर्तमेवैः। (नद्यः) - ऋ.३.३३.५

*त्रिर्यद् दिवः परि मुहूर्तमागात् स्वैर्मन्त्रैरनृतुपा ऋतावा ॥ - ऋ.३.५३.८

*युवोर्ऋतं रोदसी सत्यमस्तु महे षु णः सुविताय प्र भूतम्। - ऋ.३.५४.३

*उतो हि वां पूर्व्या आविविद्र ऋतावरी रोदसी सत्यवाचः। - ऋ.३.५४.४

*कविर्नृचक्षा अभि षीमचष्ट ऋतस्य योना विधृते मदन्ती। - ऋ.३.५४.६

*सुकृत् सुपाणिः स्ववाँ ऋतावा देवस्त्वष्टावसे तानि नो धात्। - ऋ.३.५४.१२

*विद्युद्रथा मरुत ऋष्टिमन्तो दिवो मर्या ऋतजाता अयासः। - ऋ.३.५४.१३

*समिद्धे अग्नावृतमिद् वदेम महद् देवानामसुरत्वमेकम् ॥ - ऋ.३.५५.३

*ऋतस्य त सदसीळे अन्तर्महद् देवानामसुरत्वमेकम्।। - ऋ.३.५५.१२

*ऋतस्य सा पयसा पिन्वतेळा महद् देवानामसुरत्वमेकम् ॥ - ऋ.३.५५.१३

*ऋतस्य सद्म वि चरामि विद्वान् महद् देवानामसुरत्वमेकम्। - ऋ.३.५५.१४

*षड् भाराँ एको अचरन् बिभर्त्यृतं वर्षिष्ठमुप गाव आगुः। - ऋ.३.५६.२

*ऋतावरीर्योषणास्तिस्रो अप्यास्त्रिरा दिवो विदथे पत्यमानाः ॥ - ऋ.३.५६.५

*ऋतावान इषिरा दूळभासस्त्रिरा दिवो विदथे सन्तु देवाः ॥ - ऋ.३.५६.८

*सुयुग् वहन्ति प्रति वामृतेनोर्ध्वा भवन्ति पितरेव मेधाः। (अश्विनौ) - ऋ.३.५८.२

*रथो ह वामृतजा अद्रिजूतः परि द्यावापृथिवी याति सद्यः ॥ - ऋ.३.५८.८

*ऋतावरी दिवो अर्कैरबोध्या रेवती रोदसी चित्रमस्थात्। (उषाः) - ऋ.३.६१.६

*ऋतस्य बुध्न उषसामिषण्यन् वृषा मही रोदसी आ विवेश। - ऋ.३.६१.७

*सोमो जिगाति गातुविद् देवानामेति निष्कृतम्। ऋतस्य योनिमासदम् ॥ - ऋ.३.६२.१३

*गृणाना जमदग्निना योनावृतस्य सीदतम्। पातं सोममृतावृधा ॥ - ऋ.३.६२.१८

*ऋतावानमादित्य चर्षणीधृतं राजानं चर्षणीधृतम्। - ऋ.४.१.२

*प्र शर्ध आर्त प्रथमं विपन्याf ऋतस्य योना वृषभस्य नीळे। - ऋ.४.१.१२

*अस्माकमत्र पितरो मनुष्या अभि प्र सेदुर्ऋतमाशुषाणाः। - ऋ.४.१.१३

*यो मर्त्येष्वमृत ऋतावा देवो देवेष्वरतिर्निधायि। (अग्निः) - ऋ.४.२.१

*अत्या वृधस्नू रोहिता घृतस्नू ऋतस्य मन्ये मनसा जविष्ठा। - ऋ.४.२.३

* रथं न क्रन्तो अपसा भुरिजोर्ऋतं येमु: सुध्य आशुषाणाः ॥ - ऋ.४.२.१४

*अधा यथा नः पितरः परासः प्रत्नासो अग्न ऋतमाशुषाणाः। - ऋ.४.२.१६

*अकर्म ते स्वपसो अभूम ऋतमवस्रन्नुषसो विभातीः। - ऋ.४.२.१९

*त्वं चिन्नः शम्या अग्ने अस्या ऋतस्य बोध्यृतचित् स्वाधीः। - ऋ.४.३.४

*कथा शर्धाय मरुतामृताय कथा सूरे बृहते पृच्छ्यमानः। - ऋ.४.३.८

*ऋतेन ऋतं नियतमीळ आ गोरामा सचा मधुमत् पक्वमग्ने। - ऋ.४.३.९

*ऋतेन हि ष्मा वृषभश्चिदक्तः पुमाँ अग्निः पयसा पृष्ठ्येन। - ऋ.४.३.१०

*ऋतेनाद्रिं व्यसन् भिदन्तः समङ्गिरसो नवन्त गोभिः। - ऋ.४.३.११

*ऋतेन देवीरमृता अमृक्ता अर्णोभिरापो मधुमद्भिरग्ने। - ऋ.४.३.१२

*ऋतस्य पदे अधि दीद्यानं गुहा रघुष्यद् रघुयद् विवेद। - ऋ.४.५.९

*ऋतं वोचे नमसा पृच्छ्यमानस्तवाशसा जातवेदो यदीदम्। - ऋ.४.५.११

*परि त्मना मितद्रुरेति होता ऽग्निर्मन्द्रो मधुवचा ऋतावा। - ऋ.४.६.५

*ऋतावानं विचेतसं पश्यन्तो द्यामिव स्तृभिः। (अग्निः) - ऋ.४.७.३

*महाँ अग्निर्नमसा रातहव्यो वेरध्वराय सदमिदृतावा ॥ - ऋ.४.७.७

*स वेद देव आनमं देवाँ ऋतायते दमे। दाति प्रियाणि चिद् वसु ॥ (अग्निः) - ऋ.४.८.३

*अधा ह्यग्ने क्रतोर्भद्रस्य दक्षस्य साधोः। रथीर्ऋतस्य बृहतो बभूथ ॥ - ऋ.४.१०.२

*कृतं चिद्धि ष्मा सनेमि द्वेषो ऽग्न इनोषि मर्तात्। इत्था यजमानादृतावः ॥ - ऋ.४.१०.७

* स्वे योनौ नि षदतं सरूपा वि वां चिकित्सदृतचिद्ध नारी ॥ (इन्द्रः) - ऋ.४.१६.१०

*एता अर्षन्त्यललामवन्तीर्ऋतावरीरिव संक्रोशमानाः। - ऋ.४.१८.६

*प्राग्रुवो नभन्वो न वक्वा ध्वस्रा अपिन्वद् युवतीर्ऋतज्ञाः। (इन्द्रः) - ऋ.४.१९.७

*आ यात्विन्द्रो दिव आ पृथिव्या मक्षू समुद्रादुत वा पुरीषात्। स्वर्णरादवसे नो मरुत्वान् परावतो वा सदनादृतस्य ॥ - ऋ.४.२१.३

*देवो भवन्नवेदा म ऋतानां नमो जगृभ्वाँ अभि यज्जुजोषत् ॥ - ऋ.४.२३.४

*ऋतस्य हि शुरुधः सन्ति पूर्वीर्ऋतस्य धीतिर्वृजिनानि हन्ति। ऋतस्य श्लोको बधिरा ततर्द कर्णा बुधानः शुचमान आयोः ॥ ऋतस्य दृळ्हा धरुणानि सन्ति पुरूणि चन्द्रा वपुषे वपूंषि। ऋतेन दीर्घमिषणन्त पृक्ष ऋतेन गाव ऋतमा विवेशुः ॥ ऋतं येमान ऋतमिद् वनोत्यतृस्य शुष्मस्तुरया उ गव्युः। ऋताय पृथ्वी बहुले गभीरे ऋताय धेनू परमे दुहाते ॥ - ऋ.४.२३.८-१०

*उत स्य वाजी सहुरिर्ऋतावा शुश्रूषमाणस्तन्वा समर्ये। - ऋ.४.३८.७

*हंसः शुचिषद् वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्। नृषद् वरसदृतसद् व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतम् ॥ - ऋ.४.४०.५

*अहमपो अपिन्वमुक्षमाणा धारयं दिवं सदन ऋतस्य। ऋतेन पुत्रो अदितेर्ऋतावोत त्रिधातु प्रथयद्वि भूम ॥ - ऋ.४.४२.४

*ऋतस्य वा वनुषे पूर्व्याय नमो येमानो अश्विना ववर्तत् ॥ - ऋ.४.४४.३

*बृहस्पते या परमा परावदत आ त ऋतस्पृशो नि षेदुः। - ऋ.४.५०.३

*यूयं हि देवीर्ऋतयुग्भिरश्वैः परिप्रयाथ भुवनानि सद्यः। प्रबोधयन्तीरुषसः ससन्तं द्विपाच्चतुष्पाच्चरथाय जीवम् ॥ - ऋ.४.५१.५

*ता घा ता भद्रा उषसः पुरासुरभिष्टिद्युम्ना ऋतजातसत्याः। - ऋ.४.५१.७

*ऋतस्य देवीः सदसो बुधाना गवां न सर्गा उषसो जरन्ते ॥ - ऋ.४.५१.८

*अश्वेव चित्रारुषी माता गवामृतावरी। सखाभूदश्विनोरुषाः ॥ - ऋ.४.५२.२

*विधातारो वि ते दधुरजस्रा ऋतधीतयो रुरुचन्त दस्माः। - ऋ.४.५५.२

*ऋतावरी अद्रुहा देवपुत्रे यज्ञस्य नेत्री शुचयद्भिरर्कैः ॥ - ऋ.४.५६.२

*पुनाने तन्वा मिथः स्वेन दक्षेण राजथः। ऊह्याथे सनादृतम् ॥ मही मित्रस्य साधथस्तरन्ती पिप्रती ऋतम्। परि यज्ञं नि षेदथुः ॥ - ऋ.४.५६.६-७

*मधुश्चुतं घृतमिव सुपूतमृतस्य नः पतयो मृळयन्तु ॥ - ऋ.४.५७.२

*युवा कविः पुरुनिःष्ठ ऋतावा धर्ता कृष्टीनामुत मध्य इद्धः ॥ (अग्निः) - ऋ.५.१.६

*आ यस्ततान रोदसी ऋतेन नित्यं मृजन्ति वाजिनं घृतेन ॥ (अग्निः) - ऋ.५.१.७

*कदा चिकित्वो अभि चक्षसे नो ऽग्ने कदाँ ऋतचिद् यातयासे ॥ - ऋ.५.३.९

*सुप्रतीके वयोवृधा यह्वी ऋतस्य मातरा। दोषामुषासमीमहे ॥ - ऋ.५.५.६

*सं यदिषो वनामहे सं हव्या मानुषाणाम्। उत द्युम्नस्य शवस ऋतस्य रश्मिमा ददे ॥ (अग्निः) -ऋ.५.७.३

*त्वामग्न ऋतायवः समीधिरे प्रत्नं प्रत्नास ऊतये सहस्कृत। - ऋ.५.८.१

*प्राग्नये बृहते यज्ञियाय ऋतस्य वृष्णे असुराय मन्म। - ऋ.५.१२.१

*ऋतं चिकित्व ऋतमिच्चिकिद्ध्यतृस्य धारा अनु तृन्धि पूर्वीः। - ऋ.५.१२.२

*कया नो अग्न ऋतयन्नृतेन भुवो नवेदा उचथस्य नव्यः। - ऋ.५.१२.३

*यस्ते अग्ने नमसा यज्ञमीट्ट ऋतं स पात्यरुषस्य वृष्णः। - ऋ.५.१२.६

*ऋतेन ऋतं धरुणं धारयन्त यज्ञस्य शाके परमे व्योमन्। (अग्निः) - ऋ.५.१५.२

*राय ऋताय सुक्रतो गोभिः ष्याम सधमादो वीरैः स्याम सधमादः ॥ (अग्निः) - ऋ.५.२०.४

*समिद्धः शुक्र दीदिह्यतृस्य योनिमासदः ससस्य योनिमासदः ॥ (अग्निः) - ऋ.५.२१.४

*अच्छा वो अग्निमवसे देवं गासि स नो वसुः। रासत् पुत्र ऋषूणामृतावा पर्षति द्विषः ॥ - ऋ.५.२५.१

*यो म इति प्रवोचत्यश्वमेधाय सूरये। दददृचा सनिं यते ददन्मेधामृतायते ॥ - ऋ.५.२७.४

*ऋतस्य वा सदसि त्रासीथां नो यज्ञायते वा पशुषो न वाजान् ॥ - ऋ.५.४१.१

*इषुध्यव ऋतसापः पुरंधीर्वस्वीर्नो अत्र पत्नीरा धिये धुः ॥ - ऋ.५.४१.६

*पितुर्न पुत्र उपसि प्रेष्ठ आ घर्मो अग्निमृतयन्नसादि ॥ - ऋ.५.४३.७

*सुगोपा असि न दभाय सुक्रतो परो मायाभिर्ऋत आस नाम ते ॥ - ऋ.५.४४.२

*प्र व एते सुयुजो यामन्निष्टये नीचीरमुष्मै यम्य ऋतावृधः। - ऋ.५.४४.४

*ऋतं यती सरमा गा अविन्दद् विश्वानि सत्याङ्गिराश्चकार ॥ - ऋ.५.४५.७

*उत्स आसां परमे सधस्थ ऋतस्य पथा सरमा विदद् गाः ॥ - ऋ.५.४५.८

*ऋतधीतय आ गत सत्यधर्माणो अध्वरम्। अग्नेः पिबत जिह्वया ॥ - ऋ.५.५१.२

*समच्यन्त वृजनातित्विषन्त यत् स्वरन्ति घोषं विततमृतायवः ॥ - ऋ.५.५४.१२

*हये नरो मरुतो मृळता नस्तुवीमघासो अमृता ऋतज्ञाः। - ऋ.५.५७.८, ५.५८.८

*प्र वः स्पळक्रन् त्सुविताय दावने ऽर्चा दिवे प्र पृथिव्या ऋतं भरे। (मरुतः) - ऋ.५.५९.१

*को वेद नूनमेषां यत्रा मदन्ति धूतयः। ऋतजाता अरेपसः ॥ - ऋ.५.६१.१४

*ऋतेन ऋतमपिहितं ध्रुवं वां सूर्यस्य यत्र विमुचन्त्यश्वान्। (मित्रावरुणौ) - ऋ.५.६२.१

*ऋतस्य गोपावधि तिष्ठथो रथं सत्यधर्माणा परमे व्योमनि। - ऋ.५.६३.१

*ऋतेन विश्वं भुवनं वि राजथः सूर्यमा धत्थो दिवि चित्र्यं रथम् ॥ (मित्रावरुणौ) - ऋ.५.६३.७

*ता सत्पती ऋतावृध ऋतावाना जने जने ॥ (मित्रावरुणौ) - ऋ.५.६५.२

*आ चिकितान सुक्रतू देवौ मर्त रिशादसा। वरुणाय ऋतपेशसे दधीत प्रयसे महे ॥ (मित्रावरुणौ) - ऋ.५.६६.१

*तदृतं पृथिवि बृहच्छ्रव एष ऋषीणाम्। ज्रयसानावरं पृथ्वति क्षरन्ति यामभिः ॥ (मित्रावरुणौ) - ऋ.५.६६.५

*ते हि सत्या ऋतस्पृश ऋतावानो जनेजने। सुनीथासः सुदानवोंऽहोश्चिदुरुचक्रयः ॥ (मित्रावरुणौ) - ऋ.५.६७.४

*प्र वो मित्राय गायत वरुणाय विपा गिरा। महिक्षत्रावृतं बृहत् ॥ - ऋ.५.६८.१

*ऋतमृतेन सपन्तेषिरं दक्षमाशाते। अद्रुहा देवौ वर्धेते। - ऋ.५.६८.४

*द्युतद्यामानं बृहतीमृतेन ऋतावरीमरुणप्सुं विभातीम्। (उषाः) - ऋ.५.८०.१

*ऋतस्य पन्थामन्वेति साधु प्रजानतीव न दिशो मिनाति। (उषाः) - ऋ.५.८०.४

*अग्ने स क्षेषदृतपा ऋतेजा उरु ज्योतिर्नशते देवयुष्टे। - ऋ.६.३.१

*मूर्धानं दिवो अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत आ जातमग्निम्। - ऋ.६.७.१

*अयं स सूनुः सहस ऋतावा दूरात् सूर्यो न शोचिषा ततान ॥ (अग्निः) - ऋ.६.१२.१

*अग्ने मित्रो न बृहत ऋतस्याऽसि क्षत्ता वामस्य देव भूरेः ॥ (अग्निः) - ऋ.६.१३.२

*यं त्वं प्रचेत ऋतजात राया सजोषा नप्त्रापां हिनोषि ॥ - ऋ.६.१३.३

*देवानामुत यो मर्त्यानां यजिष्ठः स प्र यजतामृतावा ॥ (अग्निः) - ऋ.६.१५.१३

*ऋता यजासि महिना वि यद्भूर्हव्या वह यविष्ठ या ते अद्य ॥ (अग्निः) - ऋ.६.१५.१४

*आ देवान् वक्ष्यमृताँ ऋतावृधो यज्ञं देवेषु पिस्पृशः ॥ - ऋ.६.१५.१८

*गर्भे मातुः पितुष्पिता विदिद्युतानो अक्षरे। सीदन्नतृस्य योनिमा। (अग्निः) - ऋ.६.१६.३५

*अधारयो रोदसी देवपुत्रे प्रत्ने मातरा यह्वी ऋतस्य ॥ (इन्द्रः) - ऋ.६.१७.७

*ये अग्निजिह्वा ऋतसाप आसुर्ये मनुं चक्रुरुपरं दसाय ॥ (इन्द्रः) - ऋ.६.२१.११

*अयमुशानः पर्यद्रिमुस्रा ऋतधीतिभिर्ऋतयुग्युजानः। (इन्द्रः) - ऋ.६.३९.२

*अयमीयत ऋतयुग्भिरश्वैः स्वर्विदा नाभिना चर्षणिप्राः ॥ (इन्द्रः) - ऋ.६.३९.४

*ऋतस्य पथि वेधा अपायि श्रिये मनांसि देवासो अक्रन्। (इन्द्रः) - ऋ.६.४४.८

*यमापो अद्रयो वना गर्भमृतस्य पिप्रति। सहसा यो मथितो जायते नृभिः पृथिव्या अधि सानवि ॥ (अग्निः) - ऋ.६.४८.५

*नू नो रयिं रथ्यं चर्षणिप्रां पुरुवीरं मह ऋतस्य गोपाम्। - ऋ.६.४९.१५

*द्विजन्मानो य ऋतसापः सत्याः स्वर्वन्तो यजता अग्निजिह्वाः ॥ - ऋ.६.५०.२

*विश्वे देवा ऋतावृधो हुवानाः स्तुता मन्त्राः कविशस्ता अवन्तु ॥ - ऋ.६.५०.१४

*ऋतस्य शुचि दर्शतमनीकं रुक्मो न दिव उदिता व्यद्यौत् ॥ - ऋ.६.५१.१

*स्तुष उ वो मह ऋतस्य गोपानदितिं मित्रं वरुणं सुजातान्। - ऋ.६.५१.३

*ऋतस्य वो रथ्यः पूतदक्षानृतस्य पस्त्यसदो अदब्धान्। - ऋ.६.५१.९

*सुक्षत्रासो वरुणो मित्रो अग्निर्ऋतधीतयो वक्मराजसत्याः ॥ - ऋ.६.५१.१०

*विश्वेदेवा ऋतावध ऋतुभिर्हवनश्रुतः। जुषन्तां युज्यं पयः ॥ - ऋ.६.५२.१०

*एहि वा विमुचो नपादाघृणे सं सचावहै। रथीर्ऋतस्य नो भव ॥ (पूषा) - ऋ.६.५५.१

*य इन्द्राग्नी सुतेषु वां स्तवत् तेष्वृतावृधा। - ऋ.६.५९.४

*सा नो विश्वा अति द्विषः स्वसॄरन्या ऋतावरी। अतन्नहेव सूर्यः ॥ (सरस्वती) - ऋ.६.६१.९

*अश्वा न या वाजिना पूतबन्धू ऋता यद्गर्भमदितिर्भरध्यै। (मित्रावरुणौ) - ऋ.६.६७.४

*मघोनां मंहिष्ठा तुविशुष्म ऋतेन वृत्रतुरा सर्वसेना ॥ (इन्द्रावरुणौ) - ऋ.६.६८.२

*स इत् सुदानुः स्ववां ऋतावेन्द्रा यो वां वरुण दाशति त्मन्। (इन्द्रावरुणौ) - ऋ.६.६८.५

*यो अद्रिभित् प्रथमजा ऋतावा बृहस्पतिराङ्गिरसो हविष्मान्। - ऋ.६.७३.१

*पूषा नः पातु दुरितादृतावृधो रक्षा माकिर्नो अघशंस ईशत ॥ - ऋ.६.७५.१०

*मा नः क्षुधे मा रक्षस ऋतावो मा नो दमे मा वन आ जुहूर्थाः। (अग्निः) - ऋ.७.१.१९

*यो मर्त्येषु निध्रुविर्ऋतावा तपुर्मूर्धा घृतान्नः पावकः ॥ - ऋ.७.३.१

*विशामधायि विश्पतिर्दुरोणे ऽग्निर्मन्द्रो मधुवचा ऋतावा ॥ - ऋ.७.७.४

*प्र ये विशस्तिरन्त श्रोषमाणा आ ये मे अस्य दीधयन्नृतस्य ॥ - ऋ.७.७.६

*आ न ऋते शिशीहि विश्वमृत्विजं सुशंसो यश्च दक्षते ॥ - ऋ.७.१६.६

*यज्ञैर्य इन्द्रे दधते दुवांसि क्षयत् स राय ऋतपा ऋतेजाः ॥ (इन्द्रः) - ऋ.७.२०.६

*स शर्धदर्यो विषुणस्य जन्तोर्मा शिश्नदेवा अपि गुर्ऋतं नः ॥ (इन्द्रः) - ऋ.७.२१.५

*आपश्चित् पिप्युः स्तर्यो न गावो नक्षन्नृतं जरितारस्त इन्द्र। - ऋ.७.२३.४

*ह्वयामि देवाँ अयातुरग्ने साधन्नृतेन धियं दधामि ॥ - ऋ.७.३४.८

*मा नोऽहिर्बुध्न्यो रिषे धान्मा यज्ञो अस्य स्रिधदृतायोः ॥ - ऋ.७.३४.१७

*ये देवानां यज्ञिया यज्ञियानां मनोर्यजत्रा अमृता ऋतज्ञाः। ते नो रासन्तामुरुगायमद्य यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥ - ऋ.७.३५.१५

*प्र ब्रह्मैतु सदनादृतस्य वि रश्मिभिः ससृजे सूर्यो गाः। - ऋ.७.३६.१

*यजन्ते अस्य सख्यं वयश्च नमस्विनः स्व ऋतस्य धामन्। - ऋ.७.३६.५

*उदु तिष्ठ सवितः श्रुध्यस्य हिरण्यपाणे प्रभृतावृतस्य। - ऋ.७.३८.२

*वाजेवाजेऽवत वाजिनो नो धनेषु विप्रा अमृता ऋतज्ञाः। अस्य मध्वः पिबत मादयध्वं तृप्ता यात पथिभिर्देवयानैः ॥ - ऋ.७.३८.८

*भेजाते अद्री रथ्येव पन्थामृतं होता न इषितो यजाति ॥ - ऋ.७.३९.१

*नू रोदसी अभिष्टुते वसिष्ठैर्ऋतावानो वरुणो मित्रो अग्निः। - ऋ.७.३९.७

*अयं हि नेता वरुण ऋतस्य मित्रो राजानो अर्यमापो धुः। - ऋ.७.४०.४

*नू रोदसी अभिष्टुते वसिष्ठैर्ऋतावानो वरुणो मित्रो अग्निः। - ऋ.७.४०.७

*ते सीषपन्त जोषमा यजत्रा ऋतस्य धाराः सुदुघा दुहानाः। - ऋ.७.४३.४

*आ नो दधिक्राः पथ्यामनक्त्वृतस्य पन्थामन्वेतवा उ। - ऋ.७.४४.५

*प्र पूर्वजे पितरा नव्यसीभिर्गीर्भिः कृणुध्वं सदने ऋतस्य। (द्यावापृथिवी) - ऋ.७.५३.२

*ऋतेन सत्यमृतसाप आयञ्छुचिजन्मानः शुचयः पावकाः ॥ (मरुतः) - ऋ.७.५६.१२

*इम ऋतस्य वावृधुर्दुरोण शग्मासः पुत्रा अदितेरदब्धाः ॥ - ऋ.७.६०.५

*प्र वां स मित्रावरुणावृतावा विप्रो मन्मानि दीर्घश्रुदियर्ति। - ऋ.७.६१.२

*वि नः सहस्रं शुरुधो रदन्त्वृतावानो वरुणो मित्रो अग्निः। (सूर्यः) - ऋ.७.६२.३

*आ राजाना मह ऋतस्य गोपा सिन्धुपती क्षत्रिया यातमर्वाक्। (मित्रावरुणौ) - ऋ.७.६४.२

*ऋतस्य मित्रावरुणा पथा वामपो न नावा दुरिता तरेम ॥ - ऋ.७.६५.३

*बहवः सूरचक्षसो ऽग्निजिह्वा ऋतावृधः। (मित्रावरुणौ) - ऋ.७.६६.१०

*तद् वो अद्य मनामहे सूक्तैः सूर उदिते। यदोहते वरुणो मित्रो अर्यमा यूयमृतस्य रथ्यः ॥ - ऋ.७.६६.१२

*ऋतावान ऋतजाता ऋतावृधो घोरासो अनृतद्विषः। (आदित्याः) - ऋ.७.६६.१३

*आ यातं मित्रावरुणा जुषाणावाहुतिं नरा। पातं सोममृतावृधा ॥ - ऋ.७.६६.१९

*आ यातं मित्रावरुणा जुषाणावाहुतिं नरा। पातं सोममृतावृधा ॥ - ऋ.७.६६.१९

*स्यूमगभस्तिमृतयुग्भिरश्वैराश्विना वसुमन्तं वहेथाम् ॥ - ऋ.७.७१.३

*व्युषा आवो दिविजा ऋतेनाऽऽविष्कृण्वाना महिमानमागात्। - ऋ.७.७५.१

*त इद् देवानां सधमाद आसन्नृतावानः कवयः पूर्व्यासः। गूळ्हं ज्योतिः पितरो अन्वविन्दन् त्सत्यमन्त्रा अजनयन्नुषासम् ॥ - ऋ.७.७६.४

*अवध्रं ज्योतिरदितेर्ऋतावृधो देवस्य श्लोकं सवितुर्मनामहे ॥ (इन्द्रावरुणौ) - ऋ.७.८२.१०, ७.८३.१०

*स सुक्रतुर्ऋतचिदस्तु होता य आदित्य शवसा वां नमस्वान्। (इन्द्रावरुणौ) - ऋ.७.८५.४

*सर्गो न सृष्टो अर्वतीर्ऋतायञ्चकार महीरवनीरहभ्यः ॥ (वरुणः) - ऋ.७.८७.१

*ऋतावानः कवयो यज्ञधीराः प्रचेतसो य इषयन्त मन्म ॥ (वरुणः) - ऋ.७.८७.३

*अयमु ते सरस्वति वसिष्ठो द्वारावृतस्य सुभगे व्यावः। - ऋ.७.९५.६

*तन्म ऋतं पातु शतशारदाय यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥ - ऋ.७.१०१.६

*कदु स्तुवन्त ऋतयन्त देवत ऋषिः को विप्र ओहते। (इन्द्रः) - ऋ.८.३.१४

*प्रजामृतस्य पिप्रतः प्र यद्भरन्त वह्नयः। विप्रा ऋतस्य वाहसा ॥ - ऋ.८.६.२

*गुहा सतीरुप त्मना प्र यच्छोचन्त धीतयः। कण्वा ऋतस्य धारया ॥ (इन्द्रः) - ऋ.८.६.८

*अहमिद्धि पितुष्परि मेधामृतस्य जग्रभ। अहं सूर्य इवाजनि ॥ - ऋ.८.६.१०

*इमास्त इन्द्र पृश्नयो घृतं दुहत आशिरम्। एनामृतस्य पिप्युषीः ॥ - ऋ.८.६.१९

*नहि ष्म यद्ध वः पुरा स्तोमेभिर्वृक्तबर्हिषः। शर्धाf ऋतस्य जिन्वथ ॥ (मरुतः) - ऋ.८.७.२१

*त्रीणि पदान्यश्विनोराविः सान्ति गुहा परः। कवी ऋतस्य पत्मभिरर्वाग्जीवेभ्यस्परि ॥ - ऋ.८.८.२३

*येन सिन्धुं महीरपो रथाf इव प्रचोदयः। पन्थामृतस्य यातवे तमीमहे ॥ (इन्द्रः) - ऋ.८.१२.३

*यं विप्रा उक्थवाहसो ऽभिप्रमन्दुरायवः। घृतं न पिप्य आसन्यतृस्य यत् ॥ उत स्वराजे अदितिः स्तोममिन्द्राय जीजनत्। पुरुप्रशस्तमूतय ऋतस्य यत् ॥ अभि वह्नय ऊतये ऽनूषत प्रशस्तये। न देव विव्रता हरी ऋतस्य यत् ॥ - ऋ.८.१२.१३-१५

*इन्द्र त्वमवितेदसीत्था स्तुवतो अद्रिवः। ऋतादियर्मि ते धियं मनोयुजम् ॥ - ऋ.८.१३.२६

*वयं ते वो वरुण मित्रार्यमन् त्स्यामेदृतस्य रथ्यः ॥ - ऋ.८.१९.३५

*उप नो वाजिनीवसू यातमृतस्य पथिभिः। (अश्विनौ) - ऋ.८.२२.७

*यज्ञेभिरद्भुतक्रतुं यं कृपा सूदयन्त इत्। मित्रं न जने सुधितमृतावनि ॥ ऋतावानमृतायवो यज्ञस्य साधनं गिरा। उपो एनं जुजुषुर्नमसस्पदे ॥ (अग्निः) - ऋ.८.२३.८-९

*अग्ने त्वं यशा अस्या मित्रावरुणा वह। ऋतावाना सम्राजा पूतदक्षसा ॥ - ऋ.८.२३.३०

*ता वां विश्वस्य गोपा देवा देवेषु यज्ञिया। ऋतावाना यजसे पूतदक्षसा ॥ (मित्रावरुणौ) - ऋ.८.२५.१

*ता माता विश्ववेदसा ऽसुर्या प्रमहसा। मही जजानादितिर्ऋतावरी ॥ महान्ता मित्रावरुणा सम्राजा देवावसुरा। ऋतावानावृतमा घोषतो बृहत् ॥ - ऋ.८.२५.३-४

*तव वायवृतस्पते त्वष्टुर्जामातरद्भुत। अवांस्या वृणीमहे ॥ - ऋ.८.२६.२१

*यदद्य सूर्य उद्यति प्रियक्षत्रा ऋतं दध। - ऋ.८.२७.१९

*यद्वाभिपित्वे असुरा ऋतं यते छर्दिर्येम वि दाशुषे। - ऋ.८.२७.२०

*यथा नो मित्रो अर्यमा वरुणः सन्ति गोपाः। सुगा ऋतस्य पन्थाः ॥ - ऋ.८.३१.१३

*पूर्वीर्ऋतस्य बृहतीरनूषत स्तोतुर्मेधा असृक्षत ॥ - ऋ.८.५२.९

*घृतप्रुषः सौम्या जीरदानवः सप्त स्वसारः सदन ऋतस्य। (इन्द्रावरुणौ) - ऋ.८.५९.४

*त्वमित् सप्रथा अस्यग्ने त्रातर्ऋतस्कविः। (अग्निः) - ऋ.८.६०.५

*त्वं न इन्द्र ऋतयुस्त्वानिदो नि तृम्पसि। - ऋ.८.७०.१०

*उदीराथामृतायते युञ्जाथामश्विना रथम्। अन्ति षद्भूतु वामवः। - ऋ.८.७३.१

*अरुणप्सुरुषा अभूदकर्ज्योतिर्ऋतावरी। अन्ति षद्भूतुवामवः ॥ - ऋ.८.७३.१६

*त्वं ह यद्यविष्ठ्य सहसः सूनवाहुत। ऋतावा यज्ञियो भुवः ॥ - ऋ.८.७५.३

*वाचमष्टापदीमहं नवस्रक्तिमृतस्पृशम्। इन्द्रात् परि तन्वं ममे ॥ (इन्द्रः) - ऋ.८.७६.१२

*विदद्यत् पूर्व्यं नष्टमुदीमृतायुमीरयत्। प्रेमायुस्तारीदतीर्णम्। - ऋ.८.७९.६

*अति नो विष्पिता पुरु नौभिरपो न पर्षथ। यूयमृतस्य रथ्यः ॥ - ऋ.८.८३.३

*ऋतेन देवः सविता शमायत ऋतस्य शृङ्गमुर्विया वि पप्रथे। ऋतं सासाह महि चित् पृतन्यतो मा नो वि यौष्टं सख्या मुमोचतम् ॥ (अश्विनौ) - ऋ.८.८६.५

*दस्रा हिरण्यवर्तनी शुभस्पती पातं सोममृतावृधा ॥ - ऋ.८.८७.५

*बृहदिन्द्राय गायत मरुतो वृत्रहंतमम्। येन ज्योतिरजन्यन्नृतावृधो देवं देवाय जागृवि ॥ - ऋ.८.८९.१

*इन्द्र यस्ते नवीयसी गिरं मन्द्रामजीजनत्। चिकित्विन्मनसं धियं प्रत्नामृतस्य पिप्युषीम् ॥ - ऋ.८.९५.५

*तन्म ऋतमिन्द्र शूर चित्र पात्वपो न वज्रिन् दुरिताति पर्षि भूरि। - ऋ.८.९७.१५

*ऋतस्य मा प्रदिशो वर्धयन्त्यादर्दिरो भुवना दर्दरीमि ॥ (इन्द्रः) - ऋ.८.१००.४

*आ यन्मा वेना अरुहन्नृतस्यँ एकमासीनं हर्यतस्य पृष्ठे। (इन्द्रः) - ऋ.८.१००.५

*प्र मित्राय प्रार्यम्णे सचथ्यमृतावसो। वरूथ्यं वरुणे छन्द्यं वचः स्तोत्रं राजसु गायत ॥ - ऋ.८.१०१.५

*प्र मंहिष्ठाय गायत ऋताव्ने बृहते शुक्रशोचिषे। उपस्तुतासो अग्नये ॥ (अग्निः) - ऋ.८.१०३.८

*एष देवो विपन्युभिः पवमान ऋतायुभिः। हरिर्वाजाय मृज्यते ॥ - ऋ.९.३.३

*असृग्रमिन्दवः पथा धर्मन्नृतस्य सुश्रियः। विदाना अस्य योजनम् ॥ - ऋ.९.७.१

*इन्द्रस्य सोम राधसे पुनानो हार्दि चोदय। ऋतस्य योनिमासदम् ॥ - ऋ.९.८.३

*स सूनुर्मातरा शुचिर्जातोv जाते अरोचयत्। महान् मही ऋतावृधा ॥ - ऋ.९.९.३

*सोमा असृग्रमिन्दवः सुता ऋतस्य सादने। इन्द्राय मधुमत्तमाः ॥ - ऋ.९.१२.१

*अपघ्नन्तो अराव्णः पवमाना स्वर्दृशः। योनावृतस्य सीदत ॥ - ऋ.९.१३.९

*मधोर्धारामनुक्षर तीव्रः सधस्थमासदः। चारुर्ऋताय पीतये ॥ - ऋ.९.१७.८

*उभे सोमावचाकशन् मृगो न तक्तो अर्षसि। सीदन्नृतस्य योनिमा ॥ - ऋ.९.३२.४

*अभि द्रोणानि बभ्रवः शुक्रा ऋतस्य धारया। वाजं गोमन्तमक्षरन्। - ऋ.९.३३.२

*अभि ब्रह्मीरनूषत यह्वीर्ऋतस्य मातरः। मर्मृज्यन्ते दिवः शिशुम् ॥ - ऋ.९.३३.५

*अभीमृतस्य विष्टपं दुहते पृश्निमातरः। चारु प्रियतमं हविः ॥ - ऋ.९.३४.५

*शुम्भमान ऋतायुभिर्मृज्यमानो गभस्त्योः। पवते वारे अव्यये ॥ - ऋ.९.३६.४

*समीचीना अनूषत हरिं हिन्वन्त्यद्रिभिः। योनावृतस्य सीदत ॥ - ऋ.९.३९.६

*अभि विश्वानि वार्या ऽभि देवाँ ऋतावृधः। सोमः पुनानो अर्षति ॥ - ऋ.९.४२.५

*विश्वस्मा इत् स्वर्दृशे साधारणं रजस्तुरम्। गोपामृतस्य विर्भरत् ॥ - ऋ.९.४८.४

*परि सोम ऋतं बृहदाशुः पवित्रे अर्षति। विघ्नन् रक्षांसि देवयुः ॥ - ऋ.९.५६.१

*पवमान ऋतः कविः सोमः पवित्रमासदत्। दधत् स्तोत्रे सुवीर्यम् ॥ - ऋ.९.६२.३०

*एते असृग्रमाशवो ऽति ह्वरांसि बभ्रवः। सोमा ऋतस्य धारया ॥ - ऋ.९.६३.४

*एते धामान्यार्या शुक्रा ऋतस्य धारया। वाजं गोमन्तमक्षरन् ॥ - ऋ.९.६३.१४

*वृषणं धीभिरप्तुरं सोममृतस्य धारया। मती विप्राः समस्वरन् ॥ - ऋ.९.६३.२१

*शुम्भमाना ऋतायुभिर्मृज्यमाना गभस्त्योः। पवन्ते वारे अव्यये ॥ - ऋ.९.६४.५

*ऊर्मिर्यस्ते पवित्र आ देवावीः पर्यक्षरत्। सीदन्नृतस्य योनिमा ॥ - ऋ.९.६४.११

*मर्मृजानास आयवो वृथा समुद्रमिन्दवः। अग्मन्नृतस्य योनिमा ॥ - ऋ.९.६४.१७

*आ यद्योनिं हिरण्ययमाशुर्ऋतस्य सीदति। जहात्यप्रचेतसः ॥ - ऋ.९.६४.२०

*इन्द्रायेन्दो मरुत्वते पवस्व मधुमत्तमः। ऋतस्य योनिमासदम् ॥ - ऋ.९.६४.२२

*अच्छा समुद्रमिन्दवो ऽस्तं गावो न धेनवः। अग्मन्नृतस्य योनिमा ॥ - ऋ.९.६६.१२

*पवमान ऋतं बृहच्छुक्रं ज्योतिरजीजनत्। कृष्णा तमांसि जङ्घनत् ॥ - ऋ.९.६६.२४

*सं दक्षेण मनसा जायते कविर्ऋतस्य गर्भो निहितो यमा परः। - ऋ.९.६८.५

*अव्ये वधूयुः पवते परि त्वचि श्रथ्नीते नप्तीरदितेर्ऋतं यते। - ऋ.९.६९.३

*त्रिरस्मै सप्त धेनवो दुदुह्रे सत्यामाशिरं पूर्व्ये व्योमनि। चत्वार्यन्या भुवनानि निर्णिजे चारूणि चक्रे यदृतैरवर्धत ॥ - ऋ.९.७०.१

*जानन्नृतं प्रथमं यत् स्वर्णरं प्रशस्तये कमवृणीत सुक्रतुः ॥ - ऋ.९.७०.६

*समी गावो मतयो यन्ति संयत ऋतस्य योना सदने पुनर्भुवः ॥ - ऋ.९.७२.६

*स्रह्मेω द्रप्सस्य धमतः समस्वरन्नृतस्य योना समरन्त नाभयः। त्रीन् त्स मूर्ध्नो असुरश्चक्र आरभे सत्यस्य नावः सुकृतमपीपरन् ॥ - ऋ.९.७३.१

*अपानक्षासो बधिरा अहासत ऋतस्य पन्थां न तरन्ति दुष्कृतः ॥ - ऋ.९.७३.६

*ऋतस्य तन्तुर्विततः पवित्र आ जिह्वाया अग्रे वरुणस्य मायया। धीराश्चित् तत् समिनक्षन्त आशताऽत्रा कर्तमव पदात्यप्रभुः ॥ - ऋ.९.७३.९

*महि प्सरः सुकृतं सोम्यं मधूर्वी गव्यूतिरदितेर्ऋतं यते। - ऋ.९.७४.३

*आत्मन्वन्नभो दुह्यते घृतं पय ऋतस्य नाभिरमृतं वि जायते। - ऋ.९.७४.४

*ऋतस्य जिह्वा पवते मधु प्रियं वक्ता पतिर्धियो अस्या अदाभ्यः। दधाति पुत्रः पित्रोरपीच्यं नाम तृतीयमधि रोचने दिवः ॥ - ऋ.९.७५.२

*अभीमृतस्य दोहना अनूषताऽधि त्रिपृष्ठ उषसो वि राजति ॥ - ऋ.९.७५.३

*विश्वस्य राजा पवते स्वर्दृश ऋतस्य धीतिमृषिषाळवीवशत्। - ऋ.९.७६.४

*अभीमृतस्य सुदुघा घृतश्चुतो वाश्रा अर्षन्ति पयसेव धेनवः ॥ - ऋ.९.७७.१

*सोमस्य धारा पवते नृचक्षस ऋतेन देवान् हवते दिवस्परि। - ऋ.९.८०.१

*अपामुपस्थे अध्यायवः कविमृतस्य योना महिषा अहेषत ॥ - ऋ.९.८६.२५

*नयन्नृतस्य प्रशिषो नवीयसीः पतिर्जनीनामुप याति निष्कृतम् ॥ - ऋ.९.८६.३२

*राजा सिन्धूनां पवते पतिर्दिव ऋतस्य याति पथिभिः कनिक्रदत्। - ऋ.९.८६.३३

*राजा सिन्धूनामवसिष्ट वास ऋतस्य नावमारुहद्रजिष्ठाम्। - ऋ.९.८९.२

*द्विता व्यूर्ण्वन्नमृतस्य धाम स्वर्विदे भुवनानि प्रथन्त। धियः पिन्वानाः स्वसरे न गाव ऋतायन्तीरभि वावश्र इन्दुम् ॥ - ऋ.९.९४.२

*हरिः सृजानः पथ्यामृतस्येयर्ति वाचमरितेव नावम्। - ऋ.९.९५.२

*पवस्व सोम मधुमाँ ऋतावा ऽपो वसानो अधि सानो अव्ये। - ऋ.९.९६.१३

*प्र दानुदो दिव्यो दानुपिन्व ऋतमृताय पवते सुमेधाः। - ऋ.९.९७.२३

*द्विता भुवद्रयिपती रयीणामृतं भरत् सुभृतं चार्विन्दुः ॥ - ऋ.९.९७.२४

*कनिक्रददनु पन्थामृतस्य शुक्रो वि भास्यमृतस्य धाम। - ऋ.९.९७.३२

*तिस्रो वाच ईरयति प्र वह्निर्ऋतस्य धीतिं ब्रह्मणो मनीषाम्। - ऋ.९.९७.३४

*आ जागृविर्विप्र ऋता मतीनां सोमः पुनानो असदच्चमूषु। - ऋ.९.९७.३७

*अप्सु स्वादिष्ठो मधुमाँ ऋतावा देवो न यः सविता सत्यमन्मा ॥ - ऋ.९.९७.४८

*क्राणा शिशुर्महीनां हिन्वन्नृतस्य दीधितिम्। विश्वा परि प्रिया भुवध द्विता ॥ - ऋ.९.१०२.१

*यमी गर्भमृतावृधो दृशे चारुमजीजनन्। कविं मंहिष्ठमध्वरे पुरुस्पृहम् ॥ - ऋ.९.१०२.६

*समीचीने अभि त्मना यह्वी ऋतस्य मातरा। तन्वाना यज्ञमानुषग्यदञ्जते ॥ - ऋ.९.१०२.७

*क्रत्वा शुक्रेभिरक्षभिर्ऋणोरप व्रजं दिवः। हिन्वन्नृतस्य दीधितिं प्राध्वरे ॥ - ऋ.९.१०२.८

*पुनानः सोम धारया ऽपो वसानो अर्षसि। आ रत्नधा योनिमृतस्य सीदस्युत्सो देव हिरण्ययः ॥ - ऋ.९.१०७.४

*तरत् समुद्रं पवमान ऊर्मिणा राजा देव ऋतं बृहत्। अर्षन्मित्रस्य वरुणस्य धर्मणा प्र हिन्वान ऋतं बृहत् ॥ - ऋ.९.१०७.१५

*सहस्रधारं वृषभं पयोवृधं प्रियं देवाय जन्मने। ऋतेन य ऋतजातो विवावृधे राजा देव ऋतं बृहत् ॥ - ऋ.९.१०८.८

*अजीजनो अमृत मर्त्येष्वाँ ऋतस्य धर्मन्नमृतस्य चारुणः। - ऋ.९.११०.४

*एष पुनानो मधुमाँ ऋतावेन्द्रायेन्दुः पवते स्वादुरूर्मिः। वाजसनिर्वरिवोविद्वयोधाः ॥ - ऋ.९.११०.११

*त्वं त्यत् पणीनां विदो वसु सं मातृभिर्मर्जयसि स्व आ दम ऋतस्य धीतिभिर्दमे। - ऋ.९.१११.२

*ऋतवाकेन सत्येन श्रद्धया तपसा सुत इन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ - ऋ.९.११३.२

*ऋतं वदन्नृतद्युम्न सत्यं वदन् त्सत्यकर्मन्। श्रद्धां वदन् त्सोम राजन् धात्रा सोम परिष्कृतं इन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ - ऋ.९.११३.४

*वेषि होत्रमुत पोत्रं जनानां मन्धातासि द्रविणोदा ऋतावा। (अग्निः) - ऋ.१०.२.२

*ऋतस्य पदं कवयो नि पान्ति गुहा नामानि दधिरे पराणि ॥ (अग्निः) - ऋ.१०.५.२

*ऋतायिनी मायिनी सं दधाते मित्वा शिशुं जज्ञतुर्वर्धयन्ती। - ऋ.१०.५.३

*ऋतस्य हि वर्तनयः सुजातमिषो वाजाय प्रदिवः सचन्ते। - ऋ.१०.५.४

*अग्निर्ह नः प्रथमजा ऋतस्य पूर्व आयुनि वृषभश्च धेनुः ॥ - ऋ.१०.५.७

*यो भानुभिर्विभावा विभात्यग्निर्देवेभिर्ऋतावाजस्रः। - ऋ.१०.६.२

*ऋतावा स रोहिदश्वः पुरुक्षुर्द्युभिरस्मा अहभिर्वाममस्तु ॥ (अग्निः) - ऋ.१०.७.४

*अस्य पत्मन्नरुषीरश्वबुध्ना ऋतस्य योनौ तन्वो जुषन्त ॥ - ऋ.१०.८.३

*उषउषो हि वसो अग्रमेषि त्वं यमयोरभवो विभावा। ऋताय सप्त दधिषे पदानि जनयन् मित्रं तन्वे स्वायै ॥ - ऋ.१०.८.४

*भुवश्चक्षुर्मह ऋतस्य गोपा भुवो वरुणो यदृताय वेषि। भुवो अपां नपाज्जातवेदो भुवो दूतो यस्य हव्यं जुजोष ॥ - ऋ.१०.८.५

*न यत् पुरा चकृमा कद्ध नूनमृता वदन्तो अनृतं रपेम। (यम -यमी) - ऋ.१०.१०.४

*द्यावा ह क्षामा प्रथमे ऋतेनाऽभिश्रावे भवतः सत्यवाचा। (अग्निः) - ऋ.१०.१२.१

*देवो देवान् परिभूर्ऋतेन वहा नो हव्यं प्रथमश्चिकित्वान्। - ऋ.१०.१२.२

*अक्षरेण प्रति मिम एतामृतस्य नाभावधि सं पुनामि ॥ (हविर्धाने) - ऋ.१०.१३.३

*सप्त क्षरन्ति शिशवे मरुत्वते पित्रे पुत्रासो अप्यवीवतन्नृतम्। - ऋ.१०.१३.५

*उदीरतामवर उत् परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः। असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नो ऽवन्तु पितरो हवेषु ॥ - ऋ.१०.१५.१

*यो अग्निः क्रव्यवाहनः पितॄन् यक्षदृतावृधः। - ऋ.१०.१६.११

*ऋतस्य योगे वि ष्यध्वमूधः श्रुष्टीवरीर्भूतनास्मभ्यमापः ॥ - ऋ.१०.३०.११

*परि चिन्मर्तो द्रविणं ममन्यादृतस्य पथा नमसा विवासेत्। - ऋ.१०.३१.२

*प्र कृष्णाय रुशदपिन्वतोधर्ऋतमत्र नकिरस्मा अपीपेत् - ऋ.१०.३१.११

*तस्मै कृणोमि न धना रुणध्मि दशाहं प्राचीस्तदृतं वदामि ॥ - ऋ.१०.३४.१२

*पिपर्तु मा तदृतस्य प्रवाचनं देवानां यन्मनुष्या अमन्महि। - ऋ.१०.३५.८

*द्यौश्च नः पृथिवी च प्रचेतस ऋतावरी रक्षतामंहसो रिषः। - ऋ.१०.३६.२

*नमो मित्रस्य वरुणस्य चक्षसे महो देवाय तदृतं सपर्यत। - ऋ.१०.३७.१

*उज्जायतां परशुर्ज्योतिषा सह भूया ऋतस्य सुदुघा पुराणवत्। - ऋ.१०.४३.९

*प्र सप्तगुमृतधीतिं सुमेधां बृहस्पतिं मतिरच्छा जिगाति। (वैकुण्ठ इन्द्रः) - ऋ.१०.४७.६

*शं रोदसी सुबन्धवे यह्वी ऋतस्य मातरा। (द्यावापृथिवी) - ऋ.१०.५९.८

*मक्षु कनायाः सख्यं नवग्वा ऋतं वदन्त ऋतयुक्तिमग्मन्। - ऋ.१०.६१.१०

*मक्षू कनायाः सख्यं नवीयो राधो न रेत ऋतमित् तुरण्यन्। - ऋ.१०.६१.११

*अग्निर्ह नामोत जातवेदाः श्रुधी नो होतर्ऋतस्य होताध्रुक् ॥ - ऋ.१०.६१.१४

*द्विजा अह प्रथमजा ऋतस्येदं धेनुरदुहज्जायमाना ॥ - ऋ.१०.६१.१९

*य उदाजन् पितरो गोमयं वस्वृतेनाभिन्दन् परिवत्सरे वलम्। - ऋ.१०.६२.२

*य ऋतेन सूर्यमारोहयन् दिव्यप्रथयन् पृथिवीं मातरं वि। - ऋ.१०.६२.३

*एवा कविस्तुवीरवाँ ऋतज्ञा द्रविणस्युर्द्रविणसश्चकानः। - ऋ.१०.६४.१६

*तेषां हि मह्ना महतामनर्वणां स्तोमाँ इयर्म्यृतज्ञा ऋतावृधाम्। (विश्वेदेवाः) - ऋ.१०.६५.३

*दिवक्षसो अग्निजिह्वा ऋतावृध ऋतस्य योनिं विमृशन्त आसते। (विश्वे देवाः) - ऋ.१०.६५.७

*परिक्षिता पितरा पूर्वजावरी ऋतस्य योना क्षयतः समोकसा। - ऋ.१०.६५.८

*विश्वे देवा सह धीभिः पुरंध्या मनोर्यजत्रा अमृता ऋतज्ञाः। - ऋ.१०.६५.१४

*ये वावृधुः प्रतरं विश्ववेदस इन्द्रज्येष्ठासो अमृता ऋतावृधः ॥ (विश्वे देवाः) - ऋ.१०.६६.१

*अदितिर्द्यावापृथिवी ऋतं महदिन्द्राविष्णू मरुतः स्वर्बृहत्। - ऋ.१०.६६.४

*वृषणा द्यावापृथिवी ऋतावरी वृषा पर्जन्यो वृषणो वृषस्तुभः ॥ - ऋ.१०.६६.६

*अग्निहोतार ऋतसापो अद्रुहो ऽपो असृजन्ननु वृत्रतूर्ये ॥ - ऋ.१०.६६.८

*दैव्या होतारा प्रथमा पुरोहित ऋतस्य पन्थामन्वेमि साधुया। - ऋ.१०.६६.१३

*इमां धियं सप्तशीर्ष्णीं पिता न ऋतप्रजातां बृहतीमविन्दत्। तुरीयं स्विज्जनयद्विश्वजन्यो ऽयास्य उक्थमिन्द्राय शंसन् ॥ - ऋ.१०.६७.१

*ऋतं शंसन्त ऋजु दीध्याना दिवस्पुत्रासो असुरस्य वीराः। - ऋ.१०.६७.२

*आप्रुषायन् मधुन ऋतस्य योनिमवक्षिपन्नर्क उल्कामिव द्योः। (बृहस्पतिः) - ऋ.१०.६८.४

*ऋतस्य पथा नमसा मियेधो देवेभ्यो देवतमः सुषूदत् ॥ - ऋ.१०.७०.२

*मन्दमान ऋतादधि प्रजायै सखिभिरिन्द्र इषिरेभिरर्थम्। - ऋ.१०.७३.५

*प्रज्ञातारो न ज्येष्ठाः सुनीतयः सुशर्माणो न सोमा ऋतं यते ॥ (मरुतः) - ऋ.१०.७८.२

*तद्वामृतं रोदसी प्र ब्रवीमि जायमानो मातरा गर्भो अत्ति। (अग्निः) - ऋ.१०.७९.४

*अग्निर्गान्धवीं‰ पथ्यामृतस्याऽग्नेर्गव्यूतिर्घृत आ निषत्ता ॥ (अग्निः) - ऋ.१०.८०.६

*सत्येनोत्तभिता भूमिः सूर्येणोत्तभिता द्यौः। ऋतेनादित्यास्तिष्ठन्ति दिवि सोमो अधि श्रितः ॥ - ऋ.१०.८५.१

*ऋतस्य योनौ सुकृतस्य लोके ऽरिष्टां त्वा सह पत्या दधामि ॥ - ऋ.१०.८५.२४

*वेधा ऋतस्य वीरिणीन्द्रपत्नी महीयते विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥ - ऋ.१०.८६.१०

*त्रिर्यातुधानः प्रसितिं त एत्वृतं यो अग्ने अनृतेन हन्ति। - ऋ.१०.८७.११

*तवाग्ने होत्रं तव पोत्रमृत्वियं तव नेष्ट्रं त्वमग्निदृतायतः। - ऋ.१०.९१.१०

*ऋतस्य हि प्रसितिर्द्यौरुरु व्यचो नमो मह्यरमतिः पनीयसी। - ऋ.१०.९२.४

*स सनीळेभिः प्रसहानो अस्य भ्रातुर्न ऋते सप्तथस्य मायाः ॥ (इन्द्रः) - ऋ.१०.९९.२

*ऊर्जं गावो यवसे पीवो अत्तन ऋतस्य याः सदने कोशे अङ्ध्वे। तनूरेव तन्वो अस्तु भेषजमा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे ॥ - ऋ.१०.१००.१०

*ऊती शचीवस्तव वीर्येण वयो दधाना उशिज ऋतज्ञाः। - ऋ.१०.१०४.४

*वंसगेव पूषर्या शिम्बाता मित्रेव ऋता शतरा शातपन्ता। - ऋ.१०.१०६.५

*दूरमित पणयो वरीय उद्गावो यन्तु मिनतीर्ऋतेन। बृहस्पतिर्या अविन्दन्निगूळ्हाः सोमो ग्रावाण ऋषयश्च  विप्राः ॥ - ऋ.१०.१०८.११

*वीळुहरास्तप उग्रो मयोभूरापो देवीः प्रथमजा ऋतेन ॥ - ऋ.१०.१०९.१

*तनूनपात् पथ ऋतस्य यानान् मध्वा समञ्जन्त्स्र्वया सुजिह्व। - ऋ.१०.११०.२

*अस्य होतुः प्रदिश्यृतस्य वाचि स्वाहाकृतं हविरदन्तु देवाः ॥ - ऋ.१०.११०.११

*ऋतस्य हि सदसो धीतिरद्यौत् सं गार्ष्टेयो वृषभो गोभिरानट्। - ऋ.१०.१११.२

*मित्रासो न ये सुधिता ऋतायवो द्यावो न द्युम्नैरभि सन्ति मानुषान् ॥ - ऋ.१०.११५.७

*अग्ने घृतस्नुस्त्रिर्ऋतानि दीद्यद्वर्तिर्यज्ञं परियन्त्सुक्रतूयसे ॥ - ऋ.१०.१२२.६

*ऋतस्य सानावधि विष्टपि भ्राट् समानं योनिमभ्यनूषत व्राः ॥ - ऋ.१०.१२३.२

*ऋतस्य सानावधि चक्रमाणा रिहन्ति मध्वो अमृतस्य वाणीः ॥ - ऋ.१०.१२३.३

*ऋतेन यन्तो अधि सिन्धुमस्थुर्विदद्गन्धर्वो अमृतानि नाम। - ऋ.१०.१२३.४

*पश्यन्नन्यस्या अतिथिं वयाया ऋतस्य धाम वि मिमे पुरूणि। - ऋ.१०.१२४.३

*ऋतेन राजन्ननृतं विविञ्चन् मम राष्ट्रस्याधिपत्यमेहि ॥ (वरुणः) - ऋ.१०.१२४.५

*ऋतस्य नः पथा नयाऽति विश्वानि दुरिता नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु ॥ - ऋ.१०.१३३.६

*तव त्य इन्द्र सख्येषु वह्नय ऋतं मन्वाना व्यदर्दिरुर्वलम्। - ऋ.१०.१३८.१

*अवर्धयो वनिनो अस्य दंससा शुशोच सूर्य ऋतजातया गिरा ॥ - ऋ.१०.१३८.२

*विश्वावसुं सोम गन्धर्वमापो ददृशुषीस्तदृतेना व्यायन्। - ऋ.१०.१३८.४

*विश्वावसुं सोम गन्धर्वमापो ददृशुषीस्तदृतेना व्यायन्। (आत्मा) - ऋ.१०.१३९.४

*ऋतावानं महिषं विश्वदर्शतमग्निं सुम्नाय दधिरे पुरो जनाः। - ऋ.१०.१४०.६

*त्यं चिदत्रिमृतजुरमर्थमश्वं न यातवे। कक्षीवन्तं यदी पुना रथं न कृणुथो नवम् ॥ (अश्विनौ) - ऋ.१०.१४३.१

*ये चित् पूर्व ऋतसाप ऋतावान ऋतावृधः। पितॄन् तपस्वतो यम ताँश्चिदेवापि गच्छतात् ॥ - ऋ.१०.१५४.४

*अपां सखा प्रथमजा ऋतावा क्व स्विज्जातः कुत आ बभूव ॥ (वायुः) - ऋ.१०.१६८.३

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